इक शख्स को सोचती रही मैं / परवीन शाकिर

इक शख्स को सोचती रही मैं
फिर आईना देखती रही मैं

उसकी तरह अपना नाम लेकर
खुद को भी नयी नयी लगी मैं

तू मेरे बिना न रह सका तो
कब तेरे बगैर जी सकी मैं

आती रहे अब कहीं से आवाज़
अब तो तिरे पास आ गई मैं

दामन था तिरा कि मेरा माथा
जो दाग भी थे मिटा चुकी मैं

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