कुछ नहीं कर पा रहे तुम / केदारनाथ अग्रवाल

कुछ नहीं कर पा रहे तुम
करने के काम से उनकी तरह कतरा रहे तुम;
न किए का बोध गर्भ की तरह
असमय गिरा रहे तुम;
गर्व से ढमाढम ढोल खोखला बजा रहे तुम;
दृष्टि में उठे अपनी
दूसरों की दृष्टि में गिरे जा रहे तुम;

कुछ नहीं कर पा रहे तुम
सरेआम एक दूसरे को लतिया रहे तुम;
पार्टी की फटफटिया
फटफटा रहे तुम;
देश को समाजवादी नहीं–
घटिया बना रहे तुम;
जाल पर जाल
फाँसने-फँसाने का
बुनते चले जा रहे तुम;
गर्त में गिरते
आदमी को गिराते–
रसातल में और अधिक
पहुँचाते चले जा रहे तुम।

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s