चलते हो तो चमन को चलिये / मीर तक़ी ‘मीर’

चलते हो तो चमन को चलिये
कहतए हैं कि बहाराँ है

पात हरे हैं फूल खिले हैं
कम कम बाद-ओ-बाराँ है

आगे मैख़ाने को निकलो
अहद-ए-बादा गुज़ाराँ है

लोहु-पानी एक करे ये
इश्क़-ए-लालाअज़ाराँ है

इश्क़ में हमको “मीर” निहायत
पास-ए-इज़्ज़त-दाताँ है

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