बज उठे हवा के दफ़ वज्द में कली आई / परवीन शाकिर

बज उठे हवा के दफ़ वज्द में कली आई
जिंदगी के मेले में रक्स की घड़ी आई

मैं भी कितनी भोली थी एक लुत्फ़-ए-मुबहम पर
रक्सगह में गुरगाबी छोड़कर चली आई

चश्म-ए-दिल के सब आँसू इस हवा में खुल उट्ठे
शाखसार-ए-मिज़गां पर रुत गुलाब की आई

इससे क़ब्ल भी साए कब करीब आये थे
इस नए सफ़र में भी काम धूप ही आई

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