मुँह तका ही करे है जिस-तिस का / मीर तक़ी ‘मीर’

मुँह तका ही करे है जिस-तिस का
हैरती है ये आईना किस का

जाने क्या गुल खिलाएगी गुल-रुत
ज़र्द चेह्रा है डर से नर्गिस का

शाम ही से बुझा-सा रहता है
दिल हो गोया चराग़ मुफ़लिस का

आँख बे-इख़्तियार भर आई
हिज्र सीने में जब तेरा सिसका

थे बुरे मुगाबचो के तेवर लेक
शैख़ मयखाने से भला खिसका

फ़ैज़ ये अब्र-ए-चश्म-ए-तर से उठा
आज दामन वसीअ है इस का

ताब किस को जो हाल-ऐ-‘मीर’ सुने
हाल ही और कुछ है मजलिस का

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