आँख की किरकिरी / खंड 2 / पृष्ठ 10 / रवीन्द्रनाथ ठाकुर उपन्यास

महेंद्र घर पहुँचा। उसका चेहरा देखते ही आशा के मन का सारा संदेह कुहरे के समान एक ही क्षण में फट गया। अपनी चिट्ठियों की बात सोच कर महेंद्र के सामने मारे शर्म के वह सिर न उठा सकी। इस पर महेंद्र ने शिकवा किया- ‘ऐसे आरोप लगा कर तुमने चिट्ठियाँ लिखीं कैसे!’

और उसने जाने कितनी बार पढ़ी हुई वे तीनों चिट्ठियाँ अपनी जेब से निकालीं। आशा ने गिड़गिड़ाकर कहा – ‘तुम्हारे पैर पड़ती हूँ, इन चिट्ठियों को फाड़ फेंको!’

महेंद्र से उन चिट्ठियों को ले लेने के लिए वह उतावली हो गई। महेंद्र ने उसे रोक कर चिट्ठियों को जेब के हवाले किया। कहा – ‘मैं काम से गया और तुमने मेरा मतलब ही नहीं समझा? मुझ पर संदेह किया?’

छलछलाती आँखों से आशा बोली – ‘अबकी बार मुझे माफ कर दो! आइंदा ऐसा न होगा।’

महेंद्र ने कहा – ‘कभी नहीं?’

आशा बोली – ‘कभी नहीं।’

महेंद्र ने उसे अपने पास खींच कर चूम लिया। आशा बोली – ‘लाओ, चिट्ठियाँ दे दो, फाड़ डालूँ!’

महेंद्र बोला – ‘रहने दो उन्हें।’

आशा ने विनय से यह समझा- ‘मेरी सजा के रूप में इन्होंने चिट्ठियाँ रख ली हैं।’

चिट्ठियों के चलते आशा का मन विनोदिनी की तरफ से जरा ऐंठ गया। पति लौट आए, यह खबर वह विनोदिनी से कहने न गई, बल्कि उससे कतराती रही। विनोदिनी इसे ताड़ गई और काम के बहाने बिलकुल दूर ही रही।

महेंद्र ने सोचा – ‘अजीब है! सोचा था, अबकी बार विनोदिनी को मजे से देख पाऊँगा- उलटा ही हुआ। फिर उन चिट्ठियों का मतलब?’

महेंद्र ने अपने मन को इसके लिए सख्त बनाया कि नारी के दिल को अब कभी समझने की कोशिश नहीं करेगा। सोच रखा था, ‘विनोदिनी पास आना भी चाहेगी तो मैं दूर-दूर रहूँगा।’ अभी उसके जी में आया, ‘न, यह तो ठीक नहीं हो रहा है- सचमुच ही हम लोगों में कोई विकार आ गया है। खुले दिल की विनोदिनी से बातचीत, हँसी-दिल्लगी करके संदेह की इस घुटन को मिटा डालना ही ठीक है।’ उसने आशा से कहा – ‘लगता है, मैं ही तुम्हारी सखी की आँख की किरकिरी हो गया। उनकी तो अब झाँकी भी नहीं दिखाई पड़ती।’

उदास हो कर आशा बोली – ‘जाने उसे क्या हो गया है!’

इधर राजलक्ष्मी आ कर रोनी-सी हो कर बोलीं- ‘बेटी, अब तो विपिन की बहू को रोकना मुश्किल हो रहा है।’

महेंद्र चौंकते मगर अपने पर नियंत्रण करते हुए उसने पूछा – ‘क्यों माँ?’

‘बेटा, वह तो अबकी बार अपने घर जाने के लिए अड़ गई है। तुझे तो किसी की खातिरदारी आती नहीं। एक पराई लड़की अपने घर आई है, उसका अगर घर के लोगों-जैसा आदर-मान न हो तो रहे कैसे?’

विनोदिनी सोने के कमरे में चादर सी रही थी। महेंद्र गया। आवाज दी – ‘किरकिरी!’ विनोदिनी सम्हलकर बैठी। पूछा – ‘जी! महेंद्र बाबू!’

महेंद्र बाबू ने कहा – ‘अजीब मुसीबत है! ये हजरत महेंद्र बाबू कब से हो गए!’

अपनी सिलाई में आँखें गड़ाए हुए ही विनोदिनी बोली – ‘फिर क्या कह कर पुकारूँ आपको?’

महेंद्र ने कहा – ‘जिस नाम से अपनी सखी को पुकारती हो- ‘आँख की किरकिरी’!’

और दिन की तरह विनोदिनी ने मजाक करके कोई जवाब न दिया। वह अपनी सिलाई में लगी रही।

महेंद्र ने कहा – ‘लगता है, वही सच्चा रिश्ता है, तभी तो दुबारा जुड़ पा रहा है।’

विनोदिनी जरा रुकी। सिलाई के किनारे से बढ़ रहे धागे के छोर को दाँतों से काटती हुई बोली – ‘मुझे क्या पता, आप जानें!’

और दूसरे जवाबों को टाल कर गंभीरता से पूछ बैठी- ‘कॉलेज से एकाएक कैसे लौट आए।’

महेंद्र बोला – ‘केवल लाश की चीर-फाड़ से कब तक चलेगा?’

विनोदिनी ने फिर दाँत से सूत काटा और उसी तरह सिर झुकाए हुए बोली – ‘तो अब जीवन की जरूरत है?’

महेंद्र ने सोचा था, आज विनोदिनी से बड़े सहज ढंग से हँसी-मजाक करूँगा लेकिन बोझ इतना हो गया कि लाख कोशिश करके भी हल्का जवाब जुबान पर न आ सका। विनोदिनी आज कैसी दूरी रख कर चल रही है, यह देख कर महेंद्र उद्वेलित हो गया। इच्छा होने लगी, एक झटके से इस रुकावट को मटियामेट कर दे। उसने विनोदिनी की काटी हुई वाक्य-चिकोटी का कोई जवाब न दिया – अचानक उसके पास जा बैठा। बोला – ‘तुम हम लोगों को छोड़ कर जा क्यों रही हो? कोई अपराध हो गया है मुझसे!’ विनोदिनी इस पर जरा खिसक गई। सिलाई से सिर उठा कर उसने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें महेंद्र की ओर लगा कर कहा – ‘काम-धन्धा तो हर किसी को है। आप सब छोड़ कर कहीं और रहने चले दिए। वह क्या किसी अपराध से कम है।’

महेंद्र को कोई अच्छा जवाब ढूँढ़े न मिला। जरा देर चुप रह कर पूछा – ‘ऐसा क्या काम पड़ा है कि गए बिना होगा ही नहीं?’

बड़ी सावधानी से सुई में धागा डालती हुई वह बोली -‘काम है या नहीं, यह मैं ही जानती हूँ। आपको उसकी फेहरिस्त क्या दूँ!’

महेंद्र खिड़की से बाहर चिंतित-सा बड़ी देर तक एक नारियल की फुनगी पर नजर टिकाए चुप बैठा रहा। विनोदिनी चुपचाप सिलाई करती रही। यह हाल कि फर्श पर सुई गिरे, तो आवाज सुनाई दे! बड़ी देर बाद महेंद्र अचानक बोल उठा। हठात जो निस्तब्धता भंग हुई, विनोदिनी चौंक पड़ी। उसकी उँगली में सुई चुभ गई।

महेंद्र ने पूछा – ‘किसी भी तरह से न रुक सकोगी?’

सुई चुभी उँगुली का खून चूसती हुई विनोदिनी ने कहा – ‘विनती किस बात की? मैं रही न रही, आपको क्या फर्क पड़ता है।’

कहते-कहते उसका गला भर आया। फिर झुक कर वह सिलाई में लग गई। लगा, उसकी पलकों की कोर में आँखों की हल्की-सी रेखा झलक पड़ी है। माघ का अपराह्न उधर शाम के अँधेरे में खोने लगा था।

लमहे-भर में महेंद्र ने विनोदिनी का हाथ दबा कर रुंधे और सजल स्वर में कहा, ‘अगर इससे मेरा कुछ बिगड़ता हो तो रुकोगी?’

विनोदिनी ने झट से हाथ छुड़ा लिया। थोड़ा सरक कर बैठ गई। महेंद्र चौंका। अपनी अंतिम बात अपने ही कानों में व्यंग्य-जैसी गूँजती रही। दोषी जीभ को उसने दाँत से काटा फिर कुछ कहते न बना।

घर में सन्नाटा छाया था, तभी आशा आ गई। विनोदिनी झट कह उठी, ‘खैर, तुम लोगों ने जब मेरी अकड़ इतनी बढ़ा रखी है, तो मेरा भी फर्ज है कि तुम लोगों की एक बात मान लूँ। जब तक विदा नहीं करोगे, मैं यहीं रहूँगी।’

पति की कामयाबी से फूली न समाती हुई आशा सखी से लिपट गई। बोली – ‘तो फिर यही पक्का रहा! तीन बार कबूल करो कि जब तक हम विदा नहीं करते, तब तक रहोगी, रहोगी, रहोगी।’

विनोदिनी ने तीन बार कबूल किया। आशा ने कहा -‘भई किरकिरी, रहना तो पड़ा, फिर नाकों चने क्यों चबवाए? अंत में मेरे पति से हार माननी ही पड़ी।’

विनोदिनी हँस कर बोली – ‘भाई साहब, हार मैंने मानी कि तुमने मानी?’

महेंद्र को जैसे काठ मार गया हो। लग रहा था, जैसे उसका अपराध तमाम कमरों में बिखरा पड़ा है। उसने गंभीर हो कर कहा – ‘हार तो मेरी ही हुई है।’

और वह कमरे से बाहर चला गया।

और दूसरे ही क्षण फिर अंदर आया। आ कर विनोदिनी से कहा – ‘मुझे माफ कर दो!’

विनोदिनी बोली – ‘क्या कुसूर किया है तुमने, लालाजी?’

महेंद्र बोला – ‘तुम्हें यों जबरदस्ती यहाँ रोक रखने का हमें कोई अधिकार नहीं।’

विनोदिनी हँस कर बोली – ‘जबरदस्ती कहाँ की है? प्यार से सीधी तरह ही तो रहने को कहा – यह जबरदस्ती थोड़े है।’

आशा सोलहों आने सहमत हो कर बोली – ‘हर्गिज नहीं।’

विनोदिनी ने कहा – ‘भाई साहब, तुम्हारी इच्छा है, मैं रहूँ। मेरे जाने से तुम्हें तकलीफ होगी- यह तो मेरी खुशकिस्मती है। क्यों भई किरकिरी, ऐसे सहृदय दुनिया में मिलते कितने हैं? और दु:ख में दुखी, सुख में सुखी भाग्य से कोई मिला, तो मैं ही उसे छोड़ कर जाने को क्यों उतावली होऊँ?’

पति को चुप रहते देख आशा जरा खिन्न मन से बोली – ‘बातों में तुमसे कौन जीते? मेरे स्वामी तो हार मान गए, अब जरा रुक भी जाओ।’

महेंद्र फिर तेजी से बाहर हो गया। उधर बिहारी कुछ देर राजलक्ष्मी से बातचीत करके महेंद्र की ओर आ रहा था। दरवाजे पर ज्यों ही बिहारी पर नजर पड़ी, महेंद्र बोल उठा- ‘भाई बिहारी, मुझ-सा नालायक दुनिया में दूसरा नहीं।’

उसने कुछ ऐसे कहा कि वह बात कमरे में पहुँच गई।

अंदर से उसी दम पुकार हुई – ‘बिहारी बाबू?’

बिहारी ने कहा – ‘अभी आया, विनोद भाभी!’

कमरे में जाते ही बिहारी ने तुरंत आशा की तरफ देखा – घूँघट में से जितना-भर दिखाई पड़ा, उसमें विषाद या वेदना की कोई निशानी ही न थी। आशा उठ कर जाने लगी। विनोदिनी उसे पकड़े रही। कहा – ‘यह तो बताएँ भाई साहब, मेरी आँखों की किरकिरी से आपका सौत का नाता है क्या? आपको देखते ही वह भाग क्यों जाना चाहती है?’

आशा ने शर्मा कर विनोदिनी को झिड़का।

बिहारी ने हँस कर कहा – ‘इसलिए कि विधाता ने मुझे वैसा खूबसूरत नहीं बनाया है।’

विनोदिनी – ‘देख लिया भई किरकिरी, बिहारी बाबू किस कदर बचा कर बात करना जानते हैं! इन्होंने तुम्हारी पसंद को दोष नहीं दिया, दिया विधाता को। लक्ष्मण-जैसे सुलक्षण देवर को पा कर तुझे आदर करना न आया, तेरी ही तकदीर खोटी है।’

बिहारी – ‘इस पर तुम्हें अगर तरस आए विनोद भाभी, तो फिर मुझे शिकवा ही क्या रहे!’

विनोदिनी – ‘समुद्र तो है ही, फिर भी बादलों के बरसे बिना चातक की प्यास क्यों नहीं मिटती?’

आशा को आखिर रोक कर न रखा जा सका। वह जबरदस्ती हाथ छुड़ा कर चली गई। बिहारी भी जाना चाह रहा था। विनोदिनी ने कहा – ‘महेंद्र बाबू को क्या हुआ है, कह सकते हैं आप?’

बिहारी ठिठक पड़ा। बोला – ‘मुझे तो कुछ पता नहीं, कुछ हुआ है क्या?’

विनोदिनी – ‘पता नहीं, मुझे तो ठीक नहीं दीखता।’

उत्सुक हो कर बिहारी कुर्सी पर बैठ गया। पूरी तरह सुन लेने के खयाल से वह उन्मुख हो कर विनोदिनी की ओर ताकता रहा। विनोदिनी कुछ न बोली। मन लगा कर चादर सीने लगी।

कुछ देर रुक कर वह बोला, ‘तुमने महेंद्र में खास कुछ गौर किया क्या?’

विनोदिनी बड़े सहज भाव से बोली – ‘क्या जानें, मुझे तो ठीक नहीं दीखता। मुझे तो अपनी किरकिरी के लिए फिक्र होती है।’ – और एक लंबी उसाँस ले कर वह सिलाई छोड़ कर जाने लगी।

बिहारी ने व्यस्त हो कर कहा – ‘जरा बैठो, भाभी!’

विनोदिनी ने कमरे के सारे खिड़की-किवाड़ खोल दिए। लालटेन की बत्ती बढ़ा दी और सिलाई का सामान लिए बिस्तर के उस छोर पर जा बैठी। बोली – ‘मैं तो यहाँ सदा रहूँगी नहीं- मेरे चले जाने पर मेरी किरकिरी का खयाल रखना- वह बेचारी दुखी न हो।’

कह कर मन के उद्वेग को जब्त करने के लिए उसने मुँह फेर लिया।

बिहारी बोल पड़ा- ‘भाभी, तुम्हें रहना ही पड़ेगा। तुम्हारा अपना कहने को कोई नहीं- इस भोली लड़की को सुख-दु:ख में बचाने का भार तुम लो- कहीं तुम छोड़ गई, तो फिर कोई चारा नहीं।’

विनोदिनी – ‘भाई साहब, दुनिया का हाल तुमसे छिपा नहीं, मैं यहाँ सदा कैसे रह सकता हूँ? लोग क्या कहेंगे?’

बिहारी – ‘लोग जो चाहें कहें, तुम ध्यान ही मत दो! तुम देवी हो, एक असहाय लड़की को दुनिया की ठोकरों से बचाना तुम्हारे ही योग्य काम है।’

विनोदिनी का रोआँ-रोआँ पुलकित हो उठा। बिहारी के इस भक्ति-उपहार को वह मन से भी गलत मान कर ठुकरा न सकी, हालाँकि वह छलना कर रही थी। ऐसा व्यवहार उसे कभी किसी से न मिला था। विनोदिनी के आँसू देख कर बिहारी मुश्किल से अपने आँसू जब्त करके महेंद्र के कमरे में चला गया। बिहारी को यह बात बिलकुल समझ में न आई कि महेंद्र ने अचानक अपने आपको नालायक क्यों कह दिया। कमरे में जा कर देखा, महेंद्र नहीं था। पता चला, वह टहलने निकल गया है। पहले बे-वजह वह घर से कभी बाहर नहीं जाया करता था। जाने-पहचाने लोगों के घर से बाहर उसे बड़ी परेशानी होती। बिहारी सोचता हुआ धीरे-धीरे अपने घर चला गया।

विनोदिनी आशा को अपने कमरे में ले आई। उसे छाती से लगा कर छलछलाई आँखों से कहा – ‘भई किरकिरी, मैं बड़ी अभागिन हूँ, बड़ी बदशकुन।’

आशा दुखी मन से बोली – ‘ऐसा क्यों कहती हो, बहन?’

सुबकते बच्चे की तरह वह आशा की छाती में मुँह गाड़ कर बोली – ‘मैं जहाँ भी रहूँगी, बुरा ही होगा। मुझे छोड़ दे बहन, छुट्टी दे! मैं अपने जंगल में चली जाऊँ।’

महेंद्र से बिहारी की मुलाकात न हो सकी, इसलिए कोई बहाना बना कर फिर वह वहाँ आया ताकि आशा और महेंद्र के बीच की आशंका वाली बात को और कुछ साफ तौर से जान सके।

वह विनोदिनी से यह अनुरोध करने का बहाना लिए आया कि कल महेंद्र को अपने यहाँ भोजन के लिए आने को कहे। उसने आवाज दी – ‘विनोद भाभी!’ और बाहर से ही बत्ती की मद्धम रोशनी में गीली आँखों वाली दोनों सखियों को आलिंगन में देख कर वह ठिठक गया। अचानक आशा के मन में हुआ कि हो न हो, आज बिहारी ने जरूर विनोदिनी से कुछ निंदा की बात कही है, तभी वह जाने की बात कर रही है। यह तो बिहारी बाबू की बड़ी ज्यादती है। ऊँहू, अच्छे मिजाज के नहीं हैं। कुढ़ कर आशा बाहर निकल आई और बिहारी भी विनोदिनी के प्रति मन की भक्ति की ओर बढ़ कर बैरँग वापस हो गया।

रात को महेंद्र ने आशा से कहा – ‘चुन्नी, मैं सुबह की गाड़ी से बनारस चला जाऊँगा।’

आशा का कलेजा धक से रह गया। पूछा, ‘क्यों?’

महेंद्र बोला – ‘काफी दिन हो गए, चाची से भेंट नहीं हुई।’ महेंद्र की यह बात सुन कर आशा शर्मिंदा हो गई। उसे यह इससे भी पहले सोचना चाहिए था। अपने सुख-दु:ख के आकर्षण में वह अपनी स्नेहमयी मौसी को भूल गई।

महेंद्र ने कहा – ‘अपने स्नेह की एकमात्र थाती को वह मेरे ही हाथों सौंप गई हैं – उन्हें एक बार देखे बिना मुझे चैन नहीं मिलता।’

कहते-कहते महेंद्र का गला भर आया। स्नेह-भरे मौन आशीर्वाद और अव्यक्त मंगल-कामना से वह बार-बार अपना दायाँ हाथ आशा के माथे पर फेरने लगा। अचानक ऐसे उमड़ आए स्नेह का मर्म आशा न समझ सकी। उसका हृदय केवल पिघल कर आँखों से बहने लगा। आज ही शाम को स्नेहवश विनोदिनी ने उसे जो कुछ कहा था, याद आया। इन दोनों में कहीं योग भी है या नहीं, वह समझ न सकी। लेकिन उसे लगा, ‘यह मानो उसके जीवन की कोई सूचना है। अच्छी बुरी, कौन जाने!’

भय से व्याकुल हो कर उसने महेंद्र को बाँहों में जकड़ लिया। महेंद्र उसके नाहक संदेह के आवेश को समझ गया। बोला – ‘चुन्नी, तुम पर तुम्हारी पुण्यवती मौसी का आशीर्वाद है। तुम्हें कोई खतरा नहीं। तुम्हारी ही भलाई के लिए वह अपना सर्वस्व छोड़ कर चली गई – तुम्हारा कभी कोई बुरा नहीं हो सकता।’

इस पर आशा ने निडर हो कर अपने मन के भय को निकाल फेंका। पति के इस आशीर्वाद को उसने अक्षय कवच के समान ग्रहण किया। मन-ही-मन उसने मौसी के चरणों की धूल को बार-बार अपने माथे से लगाया और एकाग्र हो कर बोली – ‘तुम्हारा आशीर्वाद सदा मेरे स्वामी की रक्षा करे।’

दूसरे दिन महेंद्र चला गया। विनोदिनी ने जाते समय कुछ न बोला। विनोदिनी मन में कहने लगी – ‘गलती खुद की और गुस्सा मुझ पर! ऐसा साधु पुरुष तो मैंने नहीं देखा। लेकिन ऐसी साधुता ज्यादा दिन नहीं टिकती!’

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