आँख की किरकिरी / खंड 2 / पृष्ठ 11 / रवीन्द्रनाथ ठाकुर उपन्यास

बहुत दिनों के बाद अचानक महेंद्र को आते देख कर एक ओर तो अन्नपूर्णा गदगद हो गईं और दूसरी ओर उन्हें यह शंका हुई कि शायद आशा की माँ से फिर कुछ चख-चख हो गई है – महेंद्र उसी की शिकायत पर दिलासा देने आया है। छुटपन से ही महेंद्र मुसीबत पड़ने पर अपनी चाची की शरण में जाता रहा है। कभी किसी पर उसे गुस्सा आया, तो चाची ने उसे शांत कर दिया और कभी उसे कोई तकलीफ हुई तो चाची ने धीरज से सहने की नसीहत दी। लेकिन विवाह के बाद से जो सबसे बड़ा संकट महेंद्र पर आ पड़ा, उसके प्रतिकार की कोशिश तो दूर रही – सांत्वना देने तक में वह असमर्थ रहीं। इसके बारे में जब वह यह समझ गईं कि चाहे जैसे भी वह हाथ डालें, घर की अशांति दुगुनी हो जाएगी, तो उन्होंने घर ही छोड़ दिया। बीमार बच्चा जब पानी के लिए चीखता-रोता है और पानी देने की मनाही होती है, तो दुखिया माँ जैसे दूसरे कमरे में चली जाती है, अन्नपूर्णा ठीक वैसे ही काशी चली गई थीं। सुदूर तीर्थ में रह कर धर्म-कर्म में ध्यान-मन लगा कर दीन-दुखिया को कुछ भुलाया था – महेंद्र क्या फिर उन्हीं झगड़े-झंझटों की चर्चा से उनके छिपे घाव पर चोट करने आया है?

लेकिन महेंद्र ने आशा के संबंध में अपनी माँ से कोई शिकायत नहीं की। फिर तो उनकी शंका दूसरी ओर बढ़ी। जिस महेंद्र के लिए आशा को छोड़ कर कॉलेज तक जाना गवारा न था, वह चाची की खोज-खबर लेने के लिए काशी कैसे आ पहुँचा? तो क्या आशा के प्रति उसका आकर्षण ढीला पड़ रहा है?

उन्होंने पूछा – ‘मेरे सिर की कसम महेंद्र, ठीक-ठीक बताना, चुन्नी कैसी है?’

महेंद्र बोला – ‘वह तो खासे मजे में है, चाची!’

‘आजकल वह करती क्या है, बेटे! तुम लोग अभी तक वैसे ही बच्चों-जैसे हो या घर-गिरस्ती का भी ध्यान रखते हो अब?’

महेंद्र ने कहा – ‘बचपना तो बिलकुल बंद है, चाची! सारे झंझटों की जड़ तो किताब थी – चारुपाठ – वह जाने कहाँ गायब हो गई, अब ढूँढ़े भी नहीं मिलती, कहीं।’

– ‘अरे, बिहारी क्या कर रहा है?’

महेंद्र ने कहा – ‘अपना जो काम है, उसे छोड़ कर वह सब कुछ कर रहा है। पटवारी-गुमाश्ते उसकी जायदाद की देख-भाल करते हैं। वे क्या देख-भाल करते हैं, खुदा जाने। बिहारी का हमेशा यही हाल रहा। उसका अपना काम दूसरे लोग देखते हैं, दूसरों का काम वह खुद देखता है।’

अन्नपूर्णा ने पूछा – ‘विवाह नहीं करेगा क्या?’

महेंद्र जरा हँस कर बोला – ‘कहाँ, ऐसा कुछ तो दिखाई नहीं पड़ता।’

अन्नपूर्णा को अंतर के गोपन स्थान में एक चोट-सी लगी।

महेंद्र ने कभी मजाक से, कभी गंभीर हो कर अपनी गिरस्ती का मौजूदा हाल उन्हें सुनाया, केवल विनोदिनी का कोई जिक्र उसने नहीं किया।

कॉलेज अभी खुला था। महेंद्र के ज्यादा दिन काशी में रहने की गुंजाइश न थी। लेकिन सख्त बीमारी के बाद अच्छी आबोहवा में सेहत सुधारने की जो तृप्ति होती है, काशी में अन्नपूर्णा के पास महेंद्र को हर रोज उसी तृप्ति का अनुभव हो रहा था – लिहाजा दिन बीतने लगे। अपने आप ही से विरोध की जो स्थिति हो गई थी, वह मिट गई। इन कई दिनों तक धर्मप्राण अन्नपूर्णा के साथ रह कर दुनियादारी के फर्ज़ ऐसे सहज और सुख देने वाले लगे कि महेंद्र को उनके हौआ लगने की पिछली बात हँसी उड़ाने-जैसी लगी। उसे लगा – विनोदिनी कुछ नहीं। यहाँ तक कि उसकी शक्ल भी वह साफ-साफ याद नहीं कर पाता। आखिरकार बड़ी दृढ़ता से महेंद्र मन-ही-मन बोला – ‘आशा को मेरे हृदय से बाल-भर भी खिसका सके, ऐसा तो मैं किसी को, कहीं भी नहीं देख पाता।’

उसने अन्नपूर्णा से कहा – ‘चाची, मेरे कॉलेज का हर्ज हो रहा है, अब इस बार तो मैं चलूँ! तुम संसार की माया छोड़ कर यहाँ आ बसी हो अकेले में, फिर भी अनुमति दो कि बीच-बीच में तुम्हारे चरणों की धूल ले जाया करूँ!’

काशी से लौट कर महेंद्र ने आशा को जब मौसी के भेजे गए स्नेहोपहार – एक सिंदूर की डिबिया और सफेद पत्थर का एक लोटा – दिए, तो उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। मौसी का वह स्नेहमय धीरज और उन पर अपनी तथा सास की फजीहतों की बात याद आते ही उसका हृदय व्याकुल हो उठा। उसने महेंद्र से कहा – ‘बड़ी इच्छा हो रही है कि एक बार मैं भी काशी जाऊँ और मौसी की क्षमा तथा चरणों की धूल ले आऊँ। क्या यह मुमकिन नहीं?’

महेंद्र ने आशा के मन की पीड़ा को समझा और इस बात पर राजी भी हुआ कि वह कुछ दिनों के लिए अपनी मौसी के पास जाए। लेकिन फिर अपनी पढ़ाई का हर्ज करके खुद उसे काशी ले जाने में उसे हिचक होने लगी।

आशा ने कहा – ‘मेरी बड़ी चाची जी तो जल्दी ही काशी जाने वाली हैं। उनके साथ चली जाऊँ तो क्या हर्ज है?’

महेंद्र ने जा कर राजलक्ष्मी से कहा – ‘माँ, बहू एक बार चाची से मिलने के लिए काशी जाना चाहती है।’

राजलक्ष्मी ने व्यंग्य से कहा – ‘बहू जाना चाहती है, तो जरूर जाए। जाओ, उन्हें ले जाओ!’

बिहारी राजलक्ष्मी से मिलने आया, तो वह बोलीं – ‘अरे, बिहारी, सुना तूने? अपनी बहू काशी जा रही है?’

बिहारी बोला – ‘कह क्या रही हो माँ, महेंद्र भैया फिर पढ़ाई हर्ज करके जाएँगे?’

राजलक्ष्मी बोली – ‘न-न, महेंद्र क्यों जाएँगे? महेंद्र यहीं रहेंगे। बहू अपने बड़े चाचा के साथ जाएगी।’

बिहारी भीतर-ही-भीतर परेशान हुआ। वह सोचने लगा, ‘आखिर माजरा क्या है। महेंद्र काशी गया तो आशा यहाँ रही और वह लौटा, तो अब आशा काशी जा रही है। दोनों में कुछ ऐसा हुआ है। आखिर ऐसा कितने दिन चलेगा? दोस्त हो कर भी हम इसका कोई प्रतिकार नहीं कर सकते – दूर से खड़े-खड़े तमाशा देखते रहेंगे?’

माता के व्यवहार से बड़ा ही कुढ़ कर महेंद्र अपने कमरे में आ कर बैठा था। विनोदिनी ने इस बीच महेंद्र से भेंट नहीं की थी, सो आशा उसे बगल के कमरे से यहाँ ले आने के लिए अनुरोध कर रही थी।

ऐसे में बिहारी आया। उसने महेंद्र से पूछा – ‘आशा भाभी का काशी जाना तय हुआ है?’

महेंद्र बोला – ‘क्यों न हो, कोई अड़चन है?’

बिहारी बोला – ‘अड़चन की बात कौन कह रहा है! मगर अचानक तुम्हारे दिमाग में यह आया कैसे?’

महेंद्र ने कहा – ‘अपनी मौसी को देखने की इच्छा, परदेस में रहने वाले आत्मीय के लिए व्याकुलता मानव चरित्र में होती है।’

बिहारी ने पूछा – ‘साथ तुम जा रहे हो?’

पूछते ही महेंद्र के दिमाग में आया, ‘बड़े चाचा के साथ भेजना ठीक नहीं – बिहारी इसी पर बात करने आया है।’ – ज्यादा बोल-चाल से कहीं गुस्सा न फट पड़े, इसीलिए उसने संक्षेप में कहा – ‘नहीं।’

बिहारी महेंद्र को पहचानता था। वह नाराज है, यह बिहारी से छिपा न था। वह यह भी जानता था कि उसने जिद पकड़ ली, तो उसे टस से मस नहीं किया जा सकता। इसलिए उसने फिर उसके जाने का जिक्र ही न किया। सोचा – ‘बेचारी आशा अगर जी में कोई पीर ही छिपाए जाती हो, तो विनोदिनी के साथ जाने से उसे थोड़ी-सी राहत मिलेगी।’ उसने धीरे से कहा – ‘उनके साथ विनोद भाभी जाएँ, तो अच्छा न रहेगा?’

महेंद्र चीख उठा- ‘बिहारी, अपने मन की बात खोल कर ही कहो! मेरे साथ टेढ़े-टेढ़े चलने की क्या जरूरत है? मैं समझ रहा हूँ, तुम्हें शुबहा है कि मैं विनोदिनी को प्यार करता हूँ। गलत है। प्यार मैं नहीं करता। मुझे बचाने के लिए पहरा देते फिरने की जरूरत नहीं। अपने को सम्हालो!

जहाँ पर काफी दर्द हो, वहाँ अगर कोई बेरहमी के साथ पाँवों से मसल डाले तो चोट खाया हुआ आदमी चोट करने वाले पर जिस तरह बिना कुछ विचारे टूट पड़ना चाहता है, उसी तरह रुद्ध गले से बदरंग पड़ा चेहरा लिए बिहारी कुर्सी से उठ कर महेंद्र की ओर लपका और, सहसा रुक कर किसी तरह बोल पाया- ‘ईश्वर तुम्हें क्षमा करें, मैं चला।’

लड़खड़ाता हुआ वह कमरे से बाहर निकल गया। बगल के कमरे से विनोदिनी झपट कर आई- ‘बिहारी बाबू!’

दीवार का सहारा लिए हँसने की कोशिश करते हुए बिहारी ने कहा – ‘क्या है, विनोद भाभी!’

विनोदिनी बोली – ‘किरकिरी के साथ मैं भी काशी जाऊँगी।’

बिहारी ने कहा – ‘नहीं-नहीं भाभी, यह न होगा। मैं आरजू करता हूँ, मेरे कहने से कुछ मत करना। मैं यहाँ का कोई नहीं होता, यहाँ की किसी भी बात में मैं दखल नहीं देना चाहता। तुम देवी हो, जो तुम्हें ठीक जँचे, वही करना! मैं चला।’

विनोदिनी को नम्रता से नमस्कार करके बिहारी जाने लगा।

विनोदिनी बोली – ‘मैं देवी नहीं हूँ भाई साहब, सुनो तो सही। तुम चल दोगे, तो किसी का भला न होगा। फिर मुझे दोष मत देना!’

बिहारी चला गया। महेंद्र ठगा-सा बैठा रहा।

विनोदिनी बिजली-सी कटाक्ष करती हुई बगल के कमरे में चली गई जहाँ आशा मारे शर्म के मरी-सी जा रही थी। बिहारी उसे प्यार करता है – महेंद्र के मुँह से ऐसा सुन कर वह मुँह नहीं उठा पा रही थी। लेकिन उस समय उस पर विनोदिनी को दया न आई। आशा ने अगर निगाह उठा कर देखा होता, तो वह डर जाती। सारे संसार पर मानो खून चढ़ आया था। विनोदिनी का झूठ! बेशक विनोदिनी को कोई भी नहीं प्यार करता।

आवेश में वही जो एक बार महेंद्र के मुँह से निकल पड़ा था कि मैं नालायक हूँ, उसके बाद जब वह आवेश जाता रहा तो अपने उस अचानक उबल पड़ने की वजह से बिहारी से वह सकुचा गया था। उसे लग रहा था कि उसकी सारी बातें खुल गई हैं। वह विनोदिनी को प्यार नहीं करता, फिर भी बिहारी का खयाल है, प्यार करता है। जो कुढ़न बढ़ रही थी, आज वह अचानक भभक पड़ी।

लेकिन बगल के कमरे से विनोदिनी दौड़ती आई, और उसने बिहारी को रोकने की कोशिश की और बिहारी के कहे मुताबिक वह काशी जाने को तैयार हो गई – यह सब महेंद्र की कल्पना के भी बाहर था। इस दृश्य ने महेंद्र को एक चोट पहुँचा कर अभिभूत कर दिया। उसने कहा था कि वह विनोदिनी को प्यार नहीं करता; लेकिन जो कुछ सुना, जो कुछ देखा, उसने उसे चैन न लेने दिया। चारों तरफ से उसे बेचैन बनाने लगा। और बार-बार निरे अफसोस के साथ उसके जी में होने लगा कि विनोदिनी ने मुझे यह कहते सुना कि मैं उसे प्यार नहीं करता।

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