आँख की किरकिरी / खंड 2 / पृष्ठ 5 / रवीन्द्रनाथ ठाकुर उपन्यास

बीच में यह जो झमेला खड़ा हुआ, उसे एकबारगी चुका देने की नीयत से महेंद्र ने प्रस्ताव रखा कि अगले इतवार को दमदम के बगीचे में पिकनिक कर आएँ।

आशा बहुत खुश हो गई। लेकिन विनोदिनी राजी न हुई। उसके तैयार न होने से आशा और महेंद्र मायूस हो गए। उन्हें लगा, ‘इन दिनों विनोदिनी न जाने क्यों दूर हट जाना चाहती है!’

तीसरे पहर बिहारी आया। विनोदिनी बोली – ‘जरा देखिए तो बिहारी बाबू महेंद्र बाबू दमदम जा रहे हैं पिकनिक के लिए। मैं नहीं जाना चाहती, तो सुबह से दोनों मुझसे रूठे हैं।’

बिहारी बोला – ‘नाराज होना उनका बेजा नहीं। आप साथ न गईं तो इनकी जो पिकनिक होगी, ईश्वर करे सातवें दुश्मन की भी वैसी न हो।’

विनोदिनी – ‘फिर आप भी चलिए न! आप चलें, तो मैं भी चलूँगी।’

बिहारी – ‘ठीक तो है। मगर बात यों है कि कर्म दरअसल कर्त्ता की इच्छा पर होता है। बाबू की क्या राय है।?’

बिहारी के प्रति इस पक्षपात से मालिक और मालकिन, दोनों ही भीतर-भीतर कुढ़ गए। बिहारी को साथ ले चलने की बात से महेंद्र का आधा उत्साह जाता रहा। वह बिहारी को हर तरह से यह जता देने को आतुर था कि उसकी मौजूदगी विनोदिनी को कभी पसंद नहीं – लेकिन अब तो उसे छोड़ जाना असंभव होगा।

महेंद्र ने कहा – ‘बेजा क्या है, अच्छा ही तो है। लेकिन बिहारी, तुम्हारा खास ऐब है कि जहाँ जाते हो, वहाँ कोई-न-कोई हंगामा मचाने से बाज नहीं आते। या तो वहाँ आस-पास के बच्चों की जमात जुटा लोगे या फिर गोरों से मार-पीट की नौबत। क्या कर बैठोगे क्या पता?’

बिहारी महेंद्र की अनिच्छा को समझ गया। मन-ही-मन हँसा। बोला – ‘दुनिया में यही तो मजा है। क्या से क्या हो जाए, कहाँ कौन-सा फसाद खड़ा हो जाए – पहले से कुछ नहीं कहा जा सकता। तो विनोद भाभी, तड़के ही चल देना पड़ेगा। मैं समय से हाजिर हो जाऊँगा।’

सामान और नौकरों के लिए एक थर्ड क्लास और उन लोगों के लिए एक सेकेण्ड क्लास की बग्घी लाई गई। खासा बड़ा एक पैक बक्स लिए बिहारी ठीक समय पर हाजिर हो गया।

महेंद्र ने कहा – ‘अरे यह फिर क्या उठा लाए? नौकरों वाली गाड़ी में तो अब यह आएगा नहीं।’

बिहारी बोला – ‘आप परेशान न हों, मैं ठीक किए देता हूँ।’

विनोदिनी और आशा गाड़ी पर सवार हुए। बिहारी का क्या करे, महेंद्र जरा आगा-पीछा करने लगा। बिहारी ने अपना सामान गाड़ी के ऊपर पटका और आप कोच-बक्स पर जा बैठा।

महेंद्र के जी में जी आया। वह सोच रहा था, ‘जाने बिहारी अंदर ही बैठ जाएगा कि क्या करेगा!’

विनोदिनी ने परेशान हो कर पूछा – ‘गिर तो नहीं पड़ेंगे बिहारी बाबू?’

बिहारी बोल उठा – ‘आप फिक्र न करें, गिरना या बेहोश हो जाने की भूमिका नहीं।’

जैसे ही गाड़ी खिसकी, महेंद्र ने कहा – ‘न हो तो मैं ही ऊपर जाता हूँ, बिहारी अंदर आ जाए।’

आशा ने जल्दी से उसकी चादर खींची। कहा – ‘नहीं, तुम नहीं जा सकते।’

विनोदिनी बोली – ‘आपको आदत नहीं, क्या पता गिर-विर पड़ें।’

जोश में आ कर महेंद्र ने कहा – ‘गिर पडूँगा? हर्गिज नहीं।’

और वह गाड़ी से बाहर निकलने का प्रयत्न करने लगा।

विनोदिनी – ‘तोहमत आप बिहारी बाबू पर लगाते हैं, मगर हंगामा मचाने में बेजोड़ तो आप ही हैं।’

महेंद्र ने जरा मुँह लटका कर कहा – ‘अच्छा एक काम करें। मैं एक और गाड़ी ले कर चलता हूँ, बिहारी यहाँ आ जाए।’

आशा ने कहा, ‘तो मैं तुम्हारे ही साथ चलूँगी।’

विनोदिनी बोली – ‘और मैं तब गाड़ी में से कूद पडूँ?’ होते-होते झंझट आखिर निबट गया।

रास्ते भर महेंद्र बड़ा गंभीर रहा।

गाड़ी दमदम के बगीचे में पहुँच गई। नौकरों वाली गाड़ी बहुत पहले ही रवाना हुई थी, लेकिन अभी तक उसका पता न था।

शरत का सवेरा! बड़ा ही सुहाना। धूप निकल आई थी। ओस की बूँदें सूख चुकी थीं, पर निर्मल प्रकाश से पेड़-पौधे झिलमिला रहे थे। दीवार से लगी हरसिंगार की कतार थी। नीचे फूल बिछ गए थे। मह-मह खुशबू!

कलकत्ता की ईंट की ऊँची दीवार के घेरे में बाहर आ कर आशा वन की हिरनी-सी उमग उठी। विनोदिनी के साथ उसने ढेरों फूल बीने, पेड़ से शरीफे तोड़े और नीचे बैठ कर खाए। दोनों सखियों ने पोखर में देर तक स्नान किया। एक निरर्थक आनंद से इन दो नारियों ने पेड़ों की छाया और छिटकी किरणों, पोखर के पानी और कुंजों के फूल-पत्तों को पुलकित सचेतन कर दिया।

दोनों सखियाँ नहा आईं। देखा, नौकरों वाली गाड़ी अब भी नदारद है। महेंद्र बँगले के बरामदे में बिछी एक चौकी पर बैठा-बैठा उदास हो कर एक विलायती इश्तहार पढ़ रहा था।

विनोदिनी ने पूछा – ‘और बिहारी बाबू?’

संक्षेप में महेंद्र बोला – ‘पता नहीं।’

विनोदिनी – ‘चलिए, उन्हें ढूँढ़े।’

महेंद्र – ‘आखिर उन्हें कोई चुरा कर तो ले नहीं जाएगा! ढूँढ़े बिना भी मिल जाएँगे।’

विनोदिनी – ‘मगर हो सकता है, आपकी फिक्र से वह बेहाल हो रहे हों। चल कर उन्हें दिलासा ही दे आएँ।’

तालाब के किनारे बँधा हुआ विशाल बरगद था। उसी के चौंतरे पर बिहारी अपना पैक-बक्स खोल कर मिट्टी के तेल का चूल्हा जला कर पानी गरम कर रहा था। जैसे ही लोग पहुँचे, उसने सबको चौंतरे पर बिठा कर एक-एक प्याला गरम चाय और तश्तरी में दो-एक मिठाइयाँ दे कर उनकी खातिर की। विनोदिनी बार-बार कहने लगी – ‘गनीमत है कि बिहारी बाबू सारा सरंजाम साथ ले आए हैं! वरना चाय न मिलती तो क्या हाल होता महेंद्र बाबू का।’

चाय मिली, तो महेंद्र जी उठा। फिर भी बोला – ‘यह सब बिहारी की ज्यादती है। आए हैं हजरत पिकनिक को और यहाँ भी बदस्तूर सारा इंतजाम उठा लाए हैं। इससे मजा नहीं रहता!’

तपी दोपहरी की हवा पत्तों में मर्मराहट ला कर बहती रही, तालाब के बाँध पर जामुन की डालों पर कोयल रह-रह कर कूकती रही। विनोदिनी अपने बचपन के किस्से सुनाने लगी – माँ-बाप की बात, छुटपन की सखी-सहेलियों की चर्चा। अचानक उसके माथे पर का पल्ला खिसक पड़ा। विनोदिनी की आँखों में कौतुक का जो तीखा कटाक्ष देख पैनी निगाहों वाले बिहारी के मन में आज तक तरह-तरह की शंकाएँ उठती रही थीं, वह श्याम चमक जब एक शांत सजल रेखा से मंद पड़ गई, तो बिहारी ने मानो और ही नारी को देखा। लजीली सती की नाईं विनोदिनी एकांत भक्ति से पति की सेवा कर रही है, मंगलमयी माता के समान संतान को अपनी गोद में लिए हुए है – पहले यह छवि क्षण के लिए भी कभी बिहारी के मन में न आई – आज मानो जरा देर के लिए रंगमंच का परदा उठ गया और अंदर का एक मंगल दृश्य उसे दिखाई दिया। बिहारी ने सोचा, ‘विनोदिनी बाहर से विलासिनी युवती तो है, पर उसके अंतर्मन में पूजा-निरत एक नारी तपस्या में लीन है।’ एक लंबी साँस तोड़ कर बिहारी ने मन-ही-मन कहा – ‘सही-सही अपने को मनुष्य आप भी नहीं जानता – अंतर्यामी ही जानते हैं – परिस्थितिवश जो रूप बाहर बन जाता है, दुनिया उसी को सच समझती है।’ बिहारी ने बातों के सिलसिले को टूटने न दिया, प्रश्नों से उसे जगाए रहा।

आज सुबह ही जगने के जुल्म से थके हुए महेंद्र की नींद पाँच बजे खुली। आजिजी से बोला – ‘अब चल देना चाहिए।’

विनोदिनी ने कहा – ‘थोड़ी देर और रुकें तो?’

सामान सहेजने में अँधेरा हो आया। नौकरों ने इतने में खबर दी, किराए की गाड़ी न जाने कहाँ गायब है। ढूँढ़े न मिली। गाड़ी बगीचे के बाहर खड़ी थी। दो गोरे जबर्दस्ती उसे ले कर स्टेशन चल दिए।

दूसरी गाड़ी ठीक करने के लिए नौकर भेजा गया। कुढ़ा हुआ महेंद्र बार-बार मन में कहने लगा – ‘आज का दिन मुफ्त में बर्बाद हो गया।’ ऐसी नौबत आ गई कि अपनी अधीरता वह छिपा न सका।

अँजोरिया का चाँद धीरे-धीरे झुरमुटों की ओर से खुले आकाश में आया। सुनसान अकंप बगीचा छाँह-जोत से झिलमिला उठा। इस माया-मंडित धरती पर आज विनोदिनी ने अपने को न जाने किस रूप में अनुभव किया। उसने जब तरु-वीथिका में आशा को जकड़ लिया, तो उसमें प्रणय की बनावट जरा भी न थी। आशा ने देखा, विनोदिनी की आँखों से आँसू बह रहे हैं। आशा ने पीडि़त होकर पूछा – भई आँख की किरकिरी, तुम रो क्‍यों रही हो?

विनोदिनी बोली – कुछ नहीं बहन, सब ठीक है। आज का दिन मुझे बड़ा भला लगा।

आशा ने पूछा – किस बात से इतना भला लगा?

विनोदिनी बोली – मुझे लगता है, मानो मैं मर गई हूँ, मानो परलोक में आई हूँ – यहाँ मानो मुझे मेरा सर्वस्‍व मिल सकता है।

अचरज में पड़ी आशा यह सब-कुछ न समझ सकी। मौत की बात सुनकर दुखी होकर कहा – छि:, ऐसा नहीं कहते, बहन!

गाड़ी मिली। बिहारी फिर कोच-बक्स पर जा बैठा। विनोदिनी चुपचाप ही बाहर की तरफ देखती रही – चाँदनी में अवाक पेड़ों की पाँत दौड़ते हुए घने छाया-प्रवाह की तरह उसकी आँखों से हो कर गुजरने लगी। आशा गाड़ी के एक कोने में सो गई और महेंद्र सारी राह उदास बैठा रहा।

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