दीपक दोहे / बृजकिशोर पटेल के दोहे

आशा जब डूबन लगी, तिनका हुआ सहाय।
अँधियारा डसने लगा, दीप उठा मुस्काय।।

दीपक से कहने लगी, ढलते ढलते साँझ।
तुम गाओ कोई भजन, मैं झनकाऊँ झाँझ।।

दीपक ने साँसें करी, उजियारे के नाम।
अँधियारा करने लगा, दिया तले विश्राम।।

दीपक से जितनी मिले, ज्योति करो कबूल।
खुशबू उतनी लीजिये, जितना देता फूल।।

ज्योति से ज्योति जगी, दीपक जले अनेक।
लगी टूट कर हारने, अँधियारे की टेक।।

धन वैभव सुख संपदा, ज्योतिर्मय के नाम।
दीपक सबको बाँटता, ज्योति रस अभिराम।।

दीपक कितना ही जले, होगा नहीं प्रसिद्ध।
घर का जोगी जोगड़ा, आनगाँव का सिद्ध।।

मेरी कीमत तभी तक, जब तक है यह रात।
व्यवहारिकता की लगा, दीपक करने बात।।

रात पसरती ही गई, साँस हुई कमज़ोर।
दीपक साँसे गिन रहा, कब आएगी भोर।।

तेल चुका बाती चुकी, छूटा सबका साथ।
अँधियारे से जंग में, दीपक खाली हाथ।।

भीतर तम पसरा हुआ, लक्ष्मी ठिठकी द्वार।
दीपक बिन कैसे करे, पूजन को स्वीकार।।

घर के दरवाज़े खुले, मन के पट भी खोल।
अंतर मन में दीपधर, लक्ष्मी की जय बोल।।

उजियारे की आत्मा, अँधियारे की देह।
अपने भीतर झाँकिए, मिटें सभी संदेह।।

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