प्रतिज्ञा / अध्याय 14 / प्रेमचन्द उपन्यास

बाबू दाननाथ के स्वभाव में मध्यम न था। वह जिससे मित्रता करते थे, उसके दास बन जाते थे, उसी भाँति जिसका विरोध करते थे, उसे मिट्टी में मिला देना चाहते थे। कई महीने तक वह कमलाप्रसाद के मित्र बने रहे। बस, जो कुछ थे कमलाप्रसाद थे। उन्हीं के साथ घूमना, उन्हीं के साथ उठना-बैठना। अमृतराय की सूरत से भी घृणा थी – उन्हीं की आलोचना करने में दिन गुजरता था। उनके विरुद्ध व्याख्यान दिए जाते थे, लेख लिखे जाते थे और जिस दिन प्रेमा ने टाउन हॉल में जा कर उनके कुचक्रों को मटियामेट कर दिया, उस दिन से तो वह अमृतराय के खून के प्यासे हो रहे। प्रेमा से पहले ही दिल साफ न था, अब तो उनके क्रोध का वारा-पार न रहा। प्रेमा से कुछ न कहा, इस विषय की चर्चा तक न की। प्रेमा जवाब देने को तैयार बैठी थी, लेकिन उससे बोलना-चालना छोड़ दिया। भाई पर तो जान देते थे और बहन की सूरत से भी बेजार बल्कि यों कहिए कि जिंदगी ही से बेजार थे। उन्होंने जिस आनंदमय जीवन की कल्पना की थी, वह दुस्सह रोग की भाँति उन्हें घुमाए डालता था। उनकी दशा उस मनुष्य की-सी थी, जो एक घोड़े के रंग, रूप और चाल देख कर उस पर लट्टू हो जाए, पर हाथ आ जाने पर उस पर सवार न हो सके उसकी कनौतियाँ, उसके तेवर, उसका हिनहिनाना, उसका पाँव से जमीन खुरचना ये सारी बातें उसने पहले न देखीं थीं। अब उसके पुट्ठे पर हाथ रखते भी शंका होती है। जिस मूर्ति की कल्पना करके दाननाथ एक दिन मन में फूल उठते थे, उसे अब सामने देख कर उनका चित्त लेशमात्र भी प्रसन्न न होता था। प्रेमा जी-जान से उनकी सेवा करती थी, उनका मुँह जोहा करती थी, उन्हें प्रसन्न करने की चेष्टा किया करती थी, पर दाननाथ को उसकी भाव-भंगिमाओं में बनावट की गंध आती। वह अपनी भूल पर मन-ही-मन पछताते थे और उनके भीतर की ज्वाला द्वेष का रूप धारण करके अमृतराय पर मिथ्या दोष लगाने और उनका विरोध करने में शांति लाभ करती थी। लेकिन शीघ्र ही मनस्ताप को शांत करने का यह मार्ग भी उनके लिए बंद हो गया।

‘सारे शहर में चर्चा हो रही है, आप कहते हैं, सुनी कहाँ?’

‘इसकी वजह यही है कि आप आदमियों को पहचान नहीं सकते। मुझसे खुद उन डॉक्टर साहब ने कहा, जो कमलाप्रसाद की मरहम-पट्टी करने गए थे उन्हें कमलाप्रसाद से कोई अदावत नहीं है।’

‘उन्होंने साफ कहा कि कमलाप्रसाद के मुँह और छाती में सख्त चोट आई है और एक दाँत टूट गया है।’

दाननाथ को उस वक्त तक विश्वास न आया, जब तक कि उन्होंने कमलाप्रसाद के घर जा कर तहकीकात न कर ली। कमलाप्रसाद मुँह में पट्टी बाँधे आँखें बंद किए पड़ा था। ऐसा मालूम होता था, मानो गोली लग गई है। दाननाथ की आवाज सुनी तो आँखें खोलीं और नाक सिकोड़ कर कराहते हुए बोला – ‘आइए भाई साहब, बैठिए, क्या आपको अब खबर हुई या आने की फुरसत ही न मिली? बुरे वक्त में कौन किसका होता है?’

कमलाप्रसाद ने कराह कर कहा – ‘भाग्य की बात है, भाई साहब और क्या कहूँ? उस स्त्री से ऐसी आशा न थी। जब दाने-दाने की मुहताज थी, तब अपने घर लाया। बराबर अपनी बहन समझता रहा, जो और लोग खाते थे, वही वह भी खाती थी, जो और लोग पहनते थे, वही वह भी पहनती थी, मगर वह भी शत्रुओं से मिली हुई थी। कई दिन से कह रही थी कि जरा मुझे अपने बगीचे की सैर करा दो। आज जो उसे ले कर गया तो क्या देखता हूँ कि दो मुस्टंडे बँगले के बरामदे में खड़े हैं। मुझे देखते ही दोनों ही टूट पड़े अकेले मैं क्या करता। वह पिशाचिनी भी उन दोनों के साथ मिल गई और मुझ पर डंडों का प्रहार करने लगी। ऐसी मार पड़ी है, भाई साहब कि बस, कुछ न पूछिए। वहाँ न कोई आदमी न आदमजात; किसे पुकारता? जब मैं बेहोश गिर पड़ा तो तीनों वहाँ से खिसक गए।’

‘भाई साहब, आदमी के भीतर क्या है, इसे ब्रह्मा भी नहीं जान सकते; हमारी-आपकी हस्ती भी क्या है। साधुओं के भेष में बहुधा दुष्ट……..।’

दाननाथ ने दबी जबान से पूछा – ‘भाई साहब का खयाल है कि अमृतराय……’

दाननाथ ने देखा कि अब स्पष्ट कहने के सिवाय और मार्ग नहीं है, चाहे कमलाप्रसाद नाराज ही क्यों न हो जाए। सिर नीचा करके एक अप्रिय सत्य, एक कठोर कर्तव्य का पालन करने के भाव से बोले – ‘आप बिल्कुल सत्य कहते हैं। उनमें यही तो एक शक्ति है, जो उनमें कट्टर शत्रुओं को भी खुल्लम-खुल्ला उनके सामने नहीं आने देती।’

यह कहते हुए लाला बदरीप्रसाद बाहर चले गए। दाननाथ भी उन्हीं के साथ बाहर निकल गए। कमलाप्रसाद आँखें बंद किए चुपचाप सुनता रहा। उसे भी कुल मर्यादा अपने पिता ही की भाँति प्यारी थी। बेहयाई का जामा अभी तक उसने न पहना था। प्रेम के क्षेत्र में अभी यह उसकी पहली क्रीड़ा थी, और इस पहली ही क्रीड़ा में उसके पाँव में ऐसा काँटा चुभा कि कदाचित वह फिर इधर कदम रखने का साहस भी न कर सके। मगर दाननाथ के सामने वह फटकार न सुनना चाहता था। लाला बदरीप्रसाद ने उसे केवल फटकार नहीं सुनाई, उसे झूठा और दगाबाज बनाया। अपनी आत्म-रक्षा के लिए उसने जो कथा गढ़ी थी, उसका भाँडा फोड़ दिया। क्या संसार में कोई पिता ऐसा निर्दयी हो सकता है? उस दिन से कमलाप्रसाद ने फिर पिता से बात न की।

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