जिसे देखते ही ख़ुमारी लगे/निदा फ़ाज़ली

जिसे देखते ही ख़ुमारी लगे उसे उम्र सारी हमारी लगे उजाला सा है उस के चारों तरफ़ वो नाज़ुक बदन पाँव भारी लगे वो ससुराल से आई है माइके उसे जितना देखो वो प्यारी लगे हसीन सूरतें और भी हैं मगर वो सब सैकड़ों में हज़ारी लगे चलो इस तरह से सजाएँ उसे ये दुनिया…

जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया/निदा फ़ाज़ली

जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया बच्चों के स्कूल में शायद तुम से मिली नहीं है दुनिया चार घरों के एक मोहल्ले के बाहर भी है आबादी जैसी तुम्हें दिखाई दी है सब की वही नहीं है दुनिया घर में ही मत उसे सजाओ इधर उधर भी ले के जाओ यूँ…

किसी भी शहर में जाओ कहीं क़याम करो / निदा फ़ाज़ली

किसी भी शहर में जाओ कहीं क़याम करो कोई फ़ज़ा कोई मंज़र किसी के नाम करो (क़याम -Stay) दुआ सलाम ज़रूरी है शहर वालों से मगर अकेले में अपना भी एहतिराम करो हमेशा अम्न नहीं होता फ़ाख़्ताओं में कभी कभार उक़ाबों से भी कलाम करो हर एक बस्ती बदलती है रंग रूप कई जहाँ भी…

कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई/निदा फ़ाज़ली

कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई आओ कहीं शराब पिएँ रात हो गई फिर यूँ हुआ कि वक़्त का पाँसा पलट गया उम्मीद जीत की थी मगर मात हो गई सूरज को चोंच में लिए मुर्ग़ा खड़ा रहा खिड़की के पर्दे खींच दिए रात हो गई वो आदमी था कितना भला…

गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया/निदा फ़ाज़ली

गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया इक इश्क़ नाम का जो परिंदा ख़ला में था उतरा जो शहर में तो दुकानों में बट गया पहले तलाशा खेत फिर दरिया की खोज की बाक़ी का वक़्त गेहूँ के दानों में बट गया जब तक था आसमान…

ये जो फैला हुआ ज़माना है/निदा फ़ाज़ली

ये जो फैला हुआ ज़माना है इस का रक़्बा ग़रीब-ख़ाना है (रक़्बा-क्षेत्र) कोई मंज़र सदा नहीं रहता हर तअल्लुक़ मुसाफ़िराना है देस परदेस क्या परिंदों का आब ओ दाना ही आशियाना है कैसी मस्जिद कहाँ का बुत-ख़ाना हर जगह उस का आस्ताना है इश्क़ की उम्र कम ही होती है बाक़ी जो कुछ है दोस्ताना…

घर से निकले तो हो सोचा भी किधर जाओगे/निदा फ़ाज़ली

घर से निकले तो हो सोचा भी किधर जाओगे हर तरफ़ तेज़ हवाएँ हैं बिखर जाओगे इतना आसाँ नहीं लफ़्ज़ों पे भरोसा करना घर की दहलीज़ पुकारेगी जिधर जाओगे शाम होते ही सिमट जाएँगे सारे रस्ते बहते दरिया से जहाँ होगे ठहर जाओगे हर नए शहर में कुछ रातें कड़ी होती हैं छत से दीवारें…

चाहतें मौसमी परिंदे हैं रुत बदलते ही लौट जाते हैं/निदा फ़ाज़ली

चाहतें मौसमी परिंदे हैं रुत बदलते ही लौट जाते हैं घोंसले बन के टूट जाते हैं दाग़ शाख़ों पे चहचहाते हैं आने वाले बयाज़ में अपनी जाने वालों के नाम लिखते हैं सब ही औरों के ख़ाली कमरों को अपनी अपनी तरह सजाते हैं मौत इक वाहिमा है नज़रों का साथ छुटता कहाँ है अपनों…

जब भी किसी ने ख़ुद को सदा दी/निदा फ़ाज़ली

जब भी किसी ने ख़ुद को सदा दी सन्नाटों में आग लगा दी मिट्टी उस की पानी उस का जैसी चाही शक्ल बना दी छोटा लगता था अफ़्साना मैं ने तेरी बात बढ़ा दी जब भी सोचा उस का चेहरा अपनी ही तस्वीर बना दी तुझ को तुझ में ढूँड के हम ने दुनिया तेरी…

हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो/निदा फ़ाज़ली

हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो अगर न हो कहीं ऐसा तो एहतिजाज भी हो रहेगी वादों में कब तक असीर ख़ुश-हाली हर एक बार ही कल क्यूँ कभी तो आज भी हो न करते शोर-शराबा तो और क्या करते तुम्हारे शहर में कुछ और काम काज भी हो हुकूमतों को…

हर तरफ़ हर जगह बे-शुमार आदमी/निदा फ़ाज़ली

हर तरफ़ हर जगह बे-शुमार आदमी फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी सुब्ह से शाम तक बोझ ढोता हुआ अपनी ही लाश का ख़ुद मज़ार आदमी हर तरफ़ भागते दौड़ते रास्ते हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ हर नए दिन नया इंतिज़ार आदमी घर की दहलीज़ से गेहूँ के…

हर इक रस्ता अंधेरों में घिरा है/निदा फ़ाज़ली

हर इक रस्ता अंधेरों में घिरा है मोहब्बत इक ज़रूरी हादसा है गरजती आँधियाँ ज़ाए हुई हैं ज़मीं पे टूट के आँसू गिरा है निकल आए किधर मंज़िल की धुन में यहाँ तो रास्ता ही रास्ता है दुआ के हाथ पत्थर हो गए हैं ख़ुदा हर ज़ेहन में टूटा पड़ा है तुम्हारा तजरबा शायद अलग…